सामाजिक व्यक्ति

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    तिमिर मन में, अब दो बिंब नहीं।
    उज्ज्वल अब सपना, किंतु उद्देश्य नहीं।
    ऊर्जा स्त्रोत अब दो नहीं,
    मस्तिष्क को अब प्रिय, केवल अन्नमय है।

    तिमिर मन में, अब बिंब नहीं दो,
    उज्ज्वल सपना, पर लक्ष्य नहीं हो।
    ऊर्जा का स्त्रोत, अब एक ही बना,
    मस्तिष्क को प्रिय, अन्नमय तना।

    पसंद नहीं अब भाव भजन।
    अब समस्या नहीं सोचन को,
    न ही होता, आंतरिक टकराव ।

    कोने के कुछ सुंदर विचार,
    पूर्ण होने पर होऊंगा स्वयं को आभार।

    कथनी-करनी अब दो हैं मेरे,
    कविता लिखना अब भारी है।
    दुःखः, दर्द से ही मस्तिष्क व्याप्त।
    मन में न लेने से,
    मैं बन गया निष्क्रिय मात्र।

    एक नया वेदना, प्रति परिणाम।
    एक और विलंब, प्रति दिनांक।
    अब कष्ट, और अधिक कष्ट बढ़ा रहे।
    यह सब कर रहा है, व्यक्तित्व समाप्त।
    शायद होगा तभी यह बंद,
    जब होगा इस शरीर का अंत।

    इससे ही बचेगा, यह सामाजिक व्यक्ति।

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