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Poetry

मन के नयन

जब बचपन ने पकरा था हाथनयनो ने छोरा था साथरंगों से तब ओझल हुआथा हुआ दूर तब चेहरो से

समय का चक्र चलते रहाकृष्ण को मैं कोश्ते रहाअन्ध्यारे सा था जीवन हुआरण मन बन कर तब सोचो नेथा भीषण मुझसे युद्ध लरा

ना लर सका तब सोचो सेपरित्याग किया था जीवन काथा त्याग किया अपने तन कासोचो का और जज्बातो का

था चल परा वैकुन्ठ धामले मन मे जख्मो का हर ऐक बानजब दिखे प्रभु पर्मेस्वर मेरेटूट परा तब सब्रो का बान्ध

फ़ूट फ़ूट कर रोया थाआन्शुयो ने मन को धोया थाप्रभु मुस्काते मेरि ओर बढ़ॆमैं नत्मस्तक हो तब चरनो में गिरा

चरनो में गिरा संसार दिखाहर रूप दिखा तब मानव केकहि टूट परे हैं जिस्मो पेहैं लूट रहे तन बेटियों केकहि काट रहे अपनो के सर

कहि न्याय दबा अन्यायॊ सेबल ,धन है सच पर हावी हुआअराजक्ता सीमा तोर रहिबहु बेटियाँ आबरु खो रहि

मन पाप कर्म से भरा पराकाम भूख से है नयन भरारिस्तो का मतलब बस बचा यहिबस भूख मिटे केवल तन कि

चौक गया मै ये दृश्य देखमन व्यकुल हुआ इन सबको देखसोचो ने मुझको जक्रा तबदुख हर्श मे बदला तब

अच्छा हुआ नयन हीन हि थाइन द्रिश्यो से मै विहीन हि थाबस इतना सोच मैं लीन हुआप्रभु के चर्नो मे विलीन हुआ....-अमन भारद्वाज

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Comments (2)

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  1. Dasari Kartheek Viswateja

    hey

  2. Dasari Kartheek Viswateja

    this is this