मन के नयन

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    जब बचपन ने पकरा था हाथ
    नयनो ने छोरा था साथ
    रंगों से तब ओझल हुआ
    था हुआ दूर तब चेहरो से

    समय का चक्र चलते रहा
    कृष्ण को मैं कोश्ते रहा
    अन्ध्यारे सा था जीवन हुआ
    रण मन बन कर तब सोचो ने
    था भीषण मुझसे युद्ध लरा

    ना लर सका तब सोचो से
    परित्याग किया था जीवन का
    था त्याग किया अपने तन का
    सोचो का और जज्बातो का

    था चल परा वैकुन्ठ धाम
    ले मन मे जख्मो का हर ऐक बान
    जब दिखे प्रभु पर्मेस्वर मेरे
    टूट परा तब सब्रो का बान्ध

    फ़ूट फ़ूट कर रोया था
    आन्शुयो ने मन को धोया था
    प्रभु मुस्काते मेरि ओर बढ़ॆ
    मैं नत्मस्तक हो तब चरनो में गिरा

    चरनो में गिरा संसार दिखा
    हर रूप दिखा तब मानव के
    कहि टूट परे हैं जिस्मो पे
    हैं लूट रहे तन बेटियों के
    कहि काट रहे अपनो के सर

    कहि न्याय दबा अन्यायॊ से
    बल ,धन है सच पर हावी हुआ
    अराजक्ता सीमा तोर रहि
    बहु बेटियाँ आबरु खो रहि

    मन पाप कर्म से भरा परा
    काम भूख से है नयन भरा
    रिस्तो का मतलब बस बचा यहि
    बस भूख मिटे केवल तन कि

    चौक गया मै ये दृश्य देख
    मन व्यकुल हुआ इन सबको देख
    सोचो ने मुझको जक्रा तब
    दुख हर्श मे बदला तब

    अच्छा हुआ नयन हीन हि था
    इन द्रिश्यो से मै विहीन हि था
    बस इतना सोच मैं लीन हुआ
    प्रभु के चर्नो मे विलीन हुआ....
    -अमन भारद्वाज

    Author Aman bharadwaj profile image

    Aman bharadwaj

    Philosophy and poetry to me are far deeper than just interests- They are invaluable means of introspection and comprehension.

    2 Comment(s)

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    Commenter Dasari Kartheek Viswateja
    Dasari Kartheek Viswateja 9 months ago

    hey

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    Commenter Dasari Kartheek Viswateja
    Dasari Kartheek Viswateja 9 months ago

    this is this

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