इस घनी घटा को मै क्या नाम दूं,कोई बरसात,कोई कोहरा, तो कोई महफ़िल-ए-इश्क़ कहता है।
तेरी इस हया को मै क्या नाम दूं,कोई अदा, कोई कुर्बत, तो कोई सरताज-ए-इश्क़ कहता है।
इस कयामत को मै क्या नाम दूं,कोई धड़क, कोई शिद्दत, तो कोई सज़ा-ए-इश्क़ कहता है।
इस मौत को मै क्या नाम दूं,कोई कुबूलियत, कोई मकबूल, तो कोई इश्क़ कहता है।
Madhav Menon



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